“सौर केन्द्र-समन्वय सिद्धान्त” है—सूर्य
सूर्य केवल ग्रह नहीं है—
यह आत्मा, तेज, प्रतिष्ठा, आत्मविश्वास और मानसिक प्रकाश का केन्द्र है।
कुण्डली में इसका स्थान तय करता है कि जीवन में प्रकाश कहाँ प्रकट होगा और किस दिशा से आएगा।
“सौर केन्द्र-समन्वय सिद्धान्त” है—
जो आत्मबल, नेतृत्व, कर्मशक्ति और भाग्य-उदयन के छिपे तंत्र को उजागर करता है।
⚚ प्रथम भाव में सूर्य – “स्वप्रकाश आत्मा का जन्म” ⚚
जब सूर्य लग्न में उदित हो रहा होता है, तब जातक के भीतर जन्म से ही एक अनोखा तेज रहता है।
ऐसे व्यक्ति—
* स्वयं पर प्रबल विश्वास रखते हैं
* लक्ष्य की ओर अडिग रहते हैं
* जीवन में बार-बार नए अवसर स्वयं बनाते हैं
इनमें एक आंतरिक पुकार होती है—
“मैं कुछ बड़ा करने के लिए आया हूँ।”
🔱 गुप्त उपाय:
अमावस्या की रात “ॐ ह्रां ह्रीं सौः” का जप करें।
Surya-tattva तुरंत सक्रिय होकर आत्म-शक्ति को प्रज्वलित करता है।
⚚ चतुर्थ भाव में सूर्य – “हृदय के सिंहासन पर सूर्य” ⚚
चतुर्थ में सूर्य मन की गहराइयों को प्रभावित करता है।
* घर–परिवार में तनाव
* माता से विचार-भिन्नता
* भूमि और वाहन के मामलों में उतार–चढ़ाव
परंतु यही सूर्य यदि शुभाश्रित हो जाए, तो जातक—
भूमि, भवन, संपत्ति और स्थिर सुखों का स्वामी बन जाता है।
🔱 अद्भुत उपाय:
रविवार को सूर्योदय से कुछ ही समय पहले सूर्य को नमन करें और
“ॐ घृणिः सूर्याय नमः” का जप करें।
मन, घर और हृदय—तीनों में स्थिरता आती है।
⚚ सप्तम भाव में सूर्य – “प्रेम का चुनौतीकर्ता, व्यापार का सम्राट” ⚚
सप्तम में सूर्य संबंधों को तपस्या में बदल देता है।
* विवाह में अहं-टकराव
* साथी की अपेक्षाएँ अधिक
* संयोग देर से बनते हैं
लेकिन व्यापार में?
सूर्य यहाँ रणनीति, नेतृत्व, साहस और द्रष्टा–शक्ति देता है।
ऐसे लोग अक्सर अपना खुद का साम्राज्य खड़ा करते हैं।
🔱 गुप्त उपाय:
विवाह से पहले 41 दिनों तक
“ॐ नमो भास्कराय” का जप करने से वैवाहिक समरसता बढ़ती है।
⚚ दशम भाव में सूर्य – “राजयोग का उजला सूर्य” ⚚
दशम भाव कर्म का सिंहासन है।
जब सूर्य यहाँ बैठता है, तब जातक—
* उच्च पद
* प्रशासनिक शक्ति
* समाज में मान–प्रतिष्ठा
* नेतृत्व और प्रसिद्धि
इन सबका अधिकारी बनता है।
यदि सूर्य शुभ ग्रहों के साथ हो, तो यह योग जातक को
कर्मक्षेत्र में अप्रतिम ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।
🔱 सर्वोच्च उपाय:
रविवार के सूर्यास्त में ताँबे के पात्र से सूर्य को अर्घ्य दें और मंत्र जपें—
“ॐ ह्रां ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय विद्महे…”
कर्मपथ में नए द्वार खुलते हैं।